दहलीज
Author: Rekha Gupta
📍 Location: INDIA
✍️ Writes: Poetry / Stories
दहलीज पर खड़ी हूँ मैं,
न भीतर पूरी, न बाहर सही,
एक पाँव सपनों की गलियों में,
दूजा बीते कल की परछाईं सही।
इस दहलीज ने बहुत कुछ देखा,
आँसू, हँसी, विदाई का शोर,
यहीं रुके थे मेरे फैसले,
यहीं टूटा, यहीं जुड़ा हर डोर।
अंदर जाना साहस माँगता है,
बाहर जाना भी आसान नहीं,
दहलीज सिखाती है मुझको,
ठहरना भी हार नहीं, जीत भी वहीँ।
जो दहलीज लांघ गया, वो बदला,
जो ठहरा, उसने खुद को जाना,
हर जीवन में आती है ये घड़ी,
जहाँ दहलीज बनती है पहचान का ठिकाना।
Dahleez
रेखा गुप्ता
#lafzbindu
Pratilipi
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