बिदेसिया
— भिखारी ठाकुर
पिया गइलें कलकत्ता ए सजनी,
छोड़ गइलें नयनवा में पानी।
चिट्ठी ना पाती, ना कोई संदेसवा,
कइसे कटे अब ई जिनगी रानी।
अँखिया बाट जोहे दिन-रात,
मनवा रोवे बनके दीवानी।
धन कमइहे खातिर गइलें परदेस,
सूना पड़ गइल घर-अंगनवानी।
हिंदी अर्थ
इस कविता में एक स्त्री अपने पति के वियोग का दर्द व्यक्त कर रही है। उसका पति रोज़गार कमाने के लिए कलकत्ता चला गया है, और उसके जाने के बाद उसकी आँखों में सिर्फ आँसू रह गए हैं।
ना कोई चिट्ठी आती है, ना कोई संदेश। वह हर दिन और हर रात उसकी राह देखती रहती है। उसका मन बेचैन और दुखी होकर रोता रहता है।
“बिदेसिया” केवल एक प्रेम-विरह की कविता नहीं, बल्कि उस समय के समाज की सच्चाई है, जब लोग मजबूरी में अपने घर और परिवार छोड़कर परदेस कमाने जाते थे।
LafzBindu — A place of untold emotions

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