तुम गई तो गई — मुझे इस बात का ग़म नहीं,
हर्ष इस बात का है कि तुम मेरी ज़िंदगी में आई थीं।
कुछ दिनों की हमसफ़र बनीं,
कुछ दिनों तक साथ रही,
कहाँ पता था कि
तुम सिर्फ़ “कुछ दिनों के लिए ही आई थीं।
याद तो होगा नहीं वो दिन,
जब दोनों मिलके जलेबियां चुराए थे
जब साथ बैठ खाना भी
हम एक ही थाली में खाए थे
जब मैं खुद से भी अधूरा था,
और तुम मेरी कमी भरने के लिए
खुदा से मिलकर आई थी
पता नहीं कौन-सी ख़ता कर बैठा मैं,
जो तुम छोड़कर चली गईं,
और कौन-सा पुण्य था मेरा
कि तुम मेरी ज़िंदगी में
ज़िंदगी बनकर आई थीं।
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