बेटी का दुख
Author: Rekha Gupta
📍 Location: INDIA
✍️ Writes: Poetry / Stories
मुस्कान ओढ़े रहती है हर पल,
आँखों में छुपा सैलाब कोई नहीं पढ़ता।
घर की इज़्ज़त, रिश्तों का बोझ,
बेटी के कंधों पर रख दिया जाता है चुपचाप।
सपनों को समेट कर संदूक में रख देती है,
क्योंकि पहले घर, फिर दुनिया जरूरी है।
अपनों के लिए हर दर्द सह लेती है,
पर उसका दर्द पूछना किसी को फुर्सत नहीं।
बचपन में “लड़की है” कहकर टोका गया,
जवानी में “संभलकर रहो” का डर दिया गया।
हर मोड़ पर नियम, हर कदम पर सवाल,
फिर भी उससे उम्मीद की जाती है—सब कुछ संभाल।
माँ बनकर खुद को भूल जाती है,
बेटी बनकर भी परीक्षा देती है।
आँसू तक गिराए तो बदनामी का डर,
हँसे तो कहा जाता है—ज्यादा आज़ाद है।
BETI KA DUKH
REKHA GUPTA
#Lafzbidnu
Pratilipi
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