खामोश जख्म | Khamosh jakhm ( part —2 )
Author: Alka Tiwari ( membership writer )
📍 Location: INDIA
✍️ Writes: Poetry / Stories
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AUDIO version
"अद्वय ने अपनी मुट्ठियों को इतनी ज़ोर से भींचा कि उसके नाखूनों के निशान उसकी हथेलियों पर उभर आए। उसके भीतर एक तूफ़ान उठ रहा था, लेकिन बाहर अजीब सी शांति थी। अन्वी की वह अपमानजनक हँसी और ""औकात"" वाला शब्द उसके कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतर रहा था।
उसने धीरे से सड़क पर बिखरे हुए उन भीगे कागजों को समेटा। ये सिर्फ कागज नहीं थे, ये उसकी रातों की नींद और भविष्य के सपने थे जिन्हें अन्वी ने अपने घमंड तले रौंद दिया था। भीड़ छँट चुकी थी, लोग तमाशा देखकर जा चुके थे, लेकिन अद्वय वहीं खड़ा रहा।
उसने आसमान की ओर देख कर एक गहरी साँस ली और खुद से बुदबुदाया, ""आज तुमने मेरी गरीबी का तमाशा बनाया है याद रखना, वक्त सबका बदलता है। आज मैं सड़क पर खड़ा हूँ क्योंकि मेरे पास कुछ नहीं है, लेकिन जिस दिन मैं ऊँचाई पर पहुँचूँगा, उस दिन तुम्हें खुद की नजरों में शर्मिंदगी महसूस होगी।
अद्वय जब घर पहुँचा, तो उसकी फटी हुई कमीज और भीगी हुई फाइल देखकर उसकी माँ घबरा गईं।
क्या हुआ बेटा? तू इतना परेशान क्यों लग रहा है?"" माँ ने उसके माथे पर हाथ रखते हुए पूछा।
अद्वय ने अपनी आँखों के आँसू पी लिए और माँ का हाथ थामकर बोला, ""माँ, आज से आपकी दवाइयां और इस घर की छत, सब कुछ बदलेगा। अब मैं सिर्फ काम नहीं करूँगा, अब मैं खुद को साबित करूँगा।""
उस रात अद्वय सोया नहीं। कमरे की हल्की रोशनी में वह उन भीगे हुए कागजों को सुखाता रहा। हर सूखे हुए दाग के साथ उसका इरादा और भी पक्का होता जा रहा था। उसे अहसास हो गया था कि इस दुनिया में 'खामोश ज़ख्म' का इलाज सिर्फ कामयाबी है।
अन्वी अपने आलीशान बंगले के नरम बिस्तर पर लेटी हुई थी। उसके लिए वह घटना एक मामूली सा किस्सा थी, जिसे वह शायद अगले दिन तक भूल भी जाती। उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि जिस लड़के को उसने आज 'फुटपाथ' की धूल समझा है, वही एक दिन उसके आसमान का सबसे चमकता सितारा बनने वाला है।
अद्वय ने अपनी फटी हुई डायरी के आखिरी पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा:
अपमान का बदला लड़ाई से नहीं, तरक्की से लिया जाता है
5साल बाद
शहर वही था, सड़कें भी वही थीं, लेकिन अद्वय अब वह पुराना अद्वय नहीं रहा था। ५ साल पहले जिस लड़के की आँखों में दुनिया से नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं थी, आज उसकी एक झलक पाने के लिए शहर के बड़े-बड़े बिजनेसमैन कतार में खड़े थे।
अद्वय अब 'आर.के. एंटरप्राइजेज' का CEOबन चुका था। उसकी खामोशी अब उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा हथियार थी।
एक आलीशान ऑफिस का केबिन
अद्वय अपनी कुर्सी पर बैठा एक फाइल देख रहा था। तभी उसके सेक्रेटरी ने दरवाजा खटखटाया।
""सर, 'मल्होत्रा ग्रुप' की CEO इंतज़ार कर रही हैं। उनका प्रोजेक्ट रिजेक्ट हो गया था, पर वो आपसे एक आखिरी मुलाकात की विनती कर रही हैं।
अद्वय ने बिना सिर उठाए कहा, अंदर भेज दो।
ऑफिस का भारी दरवाजा खुला। ऊँची सैंडल की आवाज़ पूरे कमरे में गूंजी। अद्वय के हाथ एक पल के लिए रुके। यह वही आवाज़ थी जिसने 5 साल पहले उसे फुटपाथ पर जलील किया था।
अन्वी कमरे के अंदर आई। उसके चेहरे पर वह पुराना आत्मविश्वास तो था, पर उसमें अब थोड़ी घबराहट की मिलावट थी। उसके हाथ में एक फाइल थी। उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि कुर्सी पर बैठा शख्स कौन है।
गुड मॉर्निंग मिस्टर अद्वय,अन्वी ने अपनी फाइल टेबल पर रखते हुए कहा। मेरा प्रोजेक्ट आपकी कंपनी के लिए बहुत फायदेमंद साबित होगा। अगर आप एक बार इसे...
अद्वय ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया। जैसे ही उनकी नज़रें मिलीं, अन्वी के शब्द उसके गले में ही अटक गए। उसकी आँखें फैल गईं और हाथ कांपने लगे।
अद्वय के चेहरे पर एक ठंडी मुस्कुराहट आई। उसने शांत स्वर में पूछा, मॉर्निंग मिस अन्वी। क्या हुआ? आपकी फाइल आज फिर भीग तो नहीं गई?
अन्वी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह 5 साल पुराना मंज़र उसकी आँखों के सामने बिजली की तरह कौंध गया वही बारिश, वही कीचड़, और वही लड़का जिसे उसने 'फुटपाथ की धूल' कहा था।
अद्वय अपनी कुर्सी से उठा और अन्वी के करीब जाकर खड़ा हो गया। उसने उसकी फाइल उठाई और उसे ध्यान से देखा, फिर उसे वापस अन्वी की तरफ बढ़ाते हुए कहा, आज मेरे हाथ नहीं कांप रहे अन्वी, और न ही यह फाइल भीगी हुई है। पर शायद आपकी हिम्मत कम पड़ रही है।
अन्वी की आँखों में आँसू आ गए, पर इस बार वे अद्वय के लिए नहीं, अपनी खुद की हार के लिए थे।
अद्वय ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा, मैंने उस दिन कहा था न कि एक दिन तुम मेरा वक्त देखोगी। आज वह वक्त आ गया है। पर अफ़सोस, आज मेरे पास तुम्हें देने के लिए सिर्फ खामोशी है।
क्या अन्वी को अपनी गलती का अहसास होगा और वह अद्वय से माफ़ी मांगेगी?
क्या अद्वय उसे और नीचा दिखाएगा या उसे सबक सिखाने के लिए उसकी मदद करेगा?
मिलते है अगले भाग मे 🙏"
Pratilipi
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