पर्दे के पीछे—लघुकथा

Author: Rekha Gupta 
📍 Location: INDIA
✍️ Writes: Poetry / Stories 
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"शहर के बड़े सभागार में आज नाटक का आखिरी शो था। बाहर दर्शकों की लंबी कतार, चमचमाती रोशनी और पोस्टरों पर छपे कलाकारों के चेहरे—

सब कुछ उत्सव जैसा लग रहा था।
लेकिन असली दुनिया कहीं और थी—पर्दे के पीछे।

वहीं कोने में खड़ा सोहन पसीने से भीगा हुआ तार समेट रहा था। वही सोहन जो पिछले तीन महीनों से सेट बनाता, लाइट ठीक करता, टूटे प्रॉप्स जोड़ता और हर शो से पहले मंच को ऐसे चमकाता जैसे मंदिर हो।

नाटक शुरू हुआ। तालियों की गड़गड़ाहट गूंजी। नायक के संवाद पर लोग वाह–वाह करने लगे। सोहन चुपचाप मुस्कुराया। उसे पता था कि जिस कुर्सी पर बैठकर नायक अभी शान से बोल रहा है, उसकी टूटी टांग उसने ही जोड़ी थी।

शो खत्म होते ही सारा श्रेय कलाकारों को मिला। फूलमालाएँ, फोटो, इंटरव्यू। दर्शक लौट गए।

रात गहराने लगी। सभागार की लाइटें बुझा दी गईं। आखिरी व्यक्ति जो वहाँ से निकला, वह सोहन ही था। उसने मंच का पर्दा धीरे से समेटा और मन ही मन कहा—
“दुनिया तालियाँ सामने वालों को देती है, पर नाटक हमेशा हम जैसे लोगों से पूरा होता है—पर्दे के पीछे वालों से।”

और खाली मंच उसकी मेहनत का मौन गवाह बना रहा।"


                            Parde ke pichhe

Rekha gupta (membership)

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