TUM AB BHI HO ( PART—2)

Author: Deepak choudhary ( founder of LafzBindu)
📍 Location: INDIA
✍️ Writes: Poetry / Stories
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                        Part-2

सपनों की दुनिया में मिला वह रास्ता मुझे एक ऐसी मंज़िल तक लाकर छोड़ गया, जहाँ दुख का एक विशाल सागर है और मैं उसमें धीरे-धीरे डूबता ही जा रहा हूँ। रास्ते में कहीं फूल मिले और कहीं काँटे भी, परंतु कभी यह नहीं सोचा था कि मंज़िल ही काँटों से भरी होगी। कभी-कभी सोचता हूँ कि ये सपने आते ही क्यों हैं? ये सपने एक पुरानी दास्तान लेकर आते हैं और जीवन की उस घटना का पुनः चित्रण कर देते हैं, जो कभी जीवन का सबसे सुखमय पल रहा होगा, परंतु वर्तमान समय में उस घटना से जुड़े एक भी पात्र का साथ न होने का दुखभरा एहसास छोड़ जाते हैं।
सपने आना अच्छी बात है। कई महान वैज्ञानिक ऐसे हुए हैं जिन्हें सपनों से ही नई खोज का सुझाव मिला। ऐसे सपने वाकई अच्छे होते हैं, परंतु किसके लिए? पसंद तो सबकी अलग-अलग होती है। जब से वह सपना मैंने देखा (पढ़ें — कहानी "तुम अब भी हो"), तभी से मुझे सपने देखना अच्छा लगने लगा। वह मेरे सपने में आई, मेरे साथ खेली, और बहुत प्रयत्नों के बाद मैं उससे वास्तविक जीवन में पुनः एक बार मिला। फिर उसके साथ मैंने कितना अच्छा समय बिताया, और मुझे बस दो पल की खुशी देकर वह फिर चली गई।
अगर वह दुबारा मिली थी, तो हमारी पहली मुलाक़ात कब हुई थी? मुझे भली-भाँति याद है कि जब मैं UKG में पढ़ता था, तभी उससे मुलाक़ात हुई थी। हम दोनों एक ही विद्यालय में पढ़ते थे। तब मेरे दिल में उसके लिए कुछ नहीं था। कुछ दिनों बाद उसने विद्यालय छोड़ दिया। जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था, तो फिर उसी विद्यालय में उसका नामांकन हुआ। इसके बाद भी उसके लिए मेरे दिल में कुछ नहीं था। मैं इस समय उसी लड़की की तलाश में था (पढ़ें — "तुम अब भी हो"), और कुछ समय बाद मैंने अपनी तलाश समाप्त कर दी थी। और यही था हमारा दूसरा मिलन।
ईश्वर ने भी क्या कमाल का खेल खेला है मेरे साथ। क्यों वे दो लोग, जो कभी बचपन में मिले थे, दुबारा मिलते हैं — वो भी एक रोमांचक घटना के बाद। वे मिले, इसके बावजूद कि मिलने की कोई गुंजाइश बचनी ही नहीं थी, लेकिन फिर भी बच गई। क्योंकि मेरा नामांकन पापा द्वारा किसी और विद्यालय में करा दिया गया था, परंतु कुछ दिनों बाद, अपने घरवालों के विरुद्ध, मैं उसी विद्यालय में चला गया — नामांकन रद्द होने से पहले।
और भी प्रश्न हैं — जैसे क्यों वे मिलते हैं तो अपनापन हो जाता है, और क्यों वे बिछड़कर भी मिल जाते हैं, और फिर बिछड़ जाते हैं। ये सारे सवाल मेरे हृदय में तीर की तरह चुभते रहते हैं, लेकिन फिर भी हृदय में एक उम्मीद की किरण जलती रहती है। अगर यह मिलने का सिलसिला यूँ ही जारी रहा, तो हो सकता है कि ज़िंदगी के किसी मोड़ पर एक बार फिर मिलेंगे, और उस बार सिर्फ़ मिलेंगे — बिछड़ेंगे नहीं।
To be continued…

जिस मोड़ पे छोड़ दिया था,
आज भी वहीं बैठ तेरा इंतज़ार करता हूँ।
लौट आए कभी तू उस रास्ते,
खुदा से बस यही फ़रियाद करता हूँ।


रात की तन्हाई मार दे मुझे तो भी अच्छा
वही कबर में लेटे हुए आहे भरूंगा 
कभी आई थी मेरी जिंदगी में तू
उस दिन को याद करूंगा |


 अगर जीते जी लौट आये तू उस रस्ते
तो, मैं तो उसी मोड़ पे मिलूंगा
अगर तू जाना भी चाहे फिर से
उसी मोड़ पे तुझे मोड़ लाऊंगा



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