दो जिंदगियां
Author: Alka Tiwari
📍 Location: INDIA
✍️ Writes: Poetry / Stories
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🎵 नीचे इस रचना को गीत के रूप में सुनें 🎵
"महलों की सुबह चाँदी सी उतरती है,
गलियों की सुबह आग सी जलती है।
रेशमी परदे खिड़की में झूलते हैं,
टूटी छत की छाँव भी डरती है।
सोने की थाली में सपने सजते हैं,
खाली थाली में भूख के साए पलते हैं।
हँसी वहाँ सितारों में चमकती है,
हँसी यहाँ आँसुओं में दमकती है।
कदम वहाँ कालीनों पर धीरे चलते हैं,
कदम यहाँ कांटों से बचकर पिघलते हैं।
वक़्त वहाँ घड़ी की टिक में रुकता है,
वक़्त यहाँ सांसों की भीख में चलता है।
गलतियाँ वहाँ हवा में उड़ जाती हैं,
गलतियाँ यहाँ ज़िंदगी बन जाती हैं।
आँसू वहाँ तकिए में खो जाते हैं,
आँसू यहाँ सड़कों पर सो जाते हैं।
रात वहाँ चाँदनी में सुकून देती है,
रात यहाँ सवालों में जागती है।
सपने वहाँ ऊँचाइयाँ नापते हैं,
सपने यहाँ आँसू से भीख मांगते हैं।
वो अपने हाथों में रौशनी थामते हैं,
ये अपने हाथों में खालीपन गिनते हैं।
मौसम वहाँ बागों में खुशबू फैलाता है,
मौसम यहाँ वीरानों में दर्द फैलाता है।
शब्द वहाँ गीत बन जाते हैं,
शब्द यहाँ खामोशी बन जाते हैं।
हवा वहाँ सरसराहट में गीत गाती है,
हवा यहाँ खिड़कियों के फटे दरवाजे पर रोती है।
रात के जाम वहाँ आनंद भरते हैं,
रात के जाम यहाँ आँखों में खार होते हैं।
सपनों की उड़ान वहाँ बादलों को छूती है,
सपनों की उड़ान यहाँ ज़मीं में ठोकर खाती है।
हँसी वहाँ महलों की दीवारों में गूँजती है,
हँसी यहाँ गलियों की मिट्टी में दबती है।
अमीर की दुनिया चमकती है सोने की तरह,
गरीब की दुनिया बुझती है राख की तरह।
लेकिन दोनों की साँसें एक ही हवा में चलती हैं,
दोनों के दर्द भी इस दुनिया में पलते हैं।
दो ज़िंदगियाँ, एक ही आसमान के नीचे,
एक चमक में, एक धुएँ में।"
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