गृहिणी, हुँ पर कम नहीं

Author: Alka Tiwari 
📍 Location: INDIA
✍️ Writes: Poetry / Stories 





मै  रसोई की खनक में ही नहीं,
खुद की धड़कनों में भी जीती हूँ,
हाँ मैं एक गृहिणी हूँ,
पर मैं सिर्फ़ किसी की ज़िम्मेदारी नहीं,
मैं मैं भी हूँ।

आटा गूँधते हाथों में
मैंने अपने सपनों की मिट्टी भी पकड़ी है,
और बर्तनों की आवाज़ के पीछे
अधूरे गीतों की धुन भी छुपी है।

दिन भर सबकी थाली भरती हूँ,
पर रात को अपने तकिये में
मैं भी खुद को भर-भर कर रोती हूँ,
क्योंकि मुझे भी हक है  महसूस करने का।

मुझे कोई ताज नहीं मिला,
कोई इनाम नहीं,
लेकिन मैं हर दिन
एक घर की नींव बनकर जीती हूँ।

किसी ने पूछा  तुम्हारा सपना क्या है
मैं चुप रही
पर भीतर से एक आवाज़ आई 
मैं भी उड़ना चाहती हूँ
फर्क बस इतना है,
मेरी उड़ान आसमान में नहीं,
दुआओं में होती है।

मैं हारूं भी तो मुस्कुराती हूँ,
क्योंकि मेरे रुकने से
पूरे घर की धड़कन रुक जाती है।

मैं आज ये मानती हूँ 
मैं गृहिणी हूँ
पर मैं कम नहीं हूँ।
मैं सिर्फ़ जीवन नहीं काटती,
मैं हर दिन उसे चुपचाप सँवारती हूँ।


✨ Aℓ𝓴𝘢

#lafzBindu 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी कविता है आपकी

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  2. बहुत सुंदर रचना, एक गृहिणी पूरे परिवार की रीढ़ होती है l लोग कहते हैं कि घर में ज्यादा काम नहीं होता, कुछ दिन घर संभाल के देखिये साहब, गृहिणी बनना आसान नहीं होता।

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