कॉन्ट्रैक मैरिज


Author: Rekha Gupta
📍 Location: INDIA
✍️ Writes: Poetry / Stories
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काग़ज़ पर दस्तख़त होते ही रिश्ता तय हो गया—छह महीने की शादी।
शर्तें साफ़ थीं: न प्यार, न अधिकार, न सवाल।
वो विदेश जाना चाहता था, उसे एक “पत्नी” चाहिए थी।
उसे पैसों की ज़रूरत थी, एक “पति” मिल गया।
शादी हुई, तस्वीरें खिंचीं, समाज संतुष्ट हुआ।
घर में दो अजनबी रहते थे—एक ही छत के नीचे, अलग-अलग ज़िंदगियाँ।
वक़्त बीतने लगा।
वो चाय बनाती तो वो धन्यवाद कह देता।
वो देर से आता तो वो इंतज़ार कर लेती।
छोटी-छोटी आदतों ने कॉन्ट्रैक्ट के कोनों को घिसना शुरू कर दिया।
एक दिन वो बीमार पड़ी।
उसने कॉन्ट्रैक्ट खोला—बीमारी में ज़िम्मेदारी का कोई ज़िक्र नहीं था।
फिर भी वो पूरी रात जागता रहा।
छह महीने पूरे हुए।
कॉन्ट्रैक्ट खत्म।
काग़ज़ पर आख़िरी तारीख़ थी, दिल पर नहीं।
वो बोली, “अब आज़ाद हैं हम।”
वो मुस्कुराया, “हाँ… मगर क्या सच में?”
टेबल पर कॉन्ट्रैक्ट पड़ा था,
और पास ही चाय के दो कप—अब भी गर्म।
कभी-कभी रिश्ते दस्तख़त से नहीं,
साथ निभाने से बन जाते हैं।

कहानी छोटी ही सही पर समझने वाली है। मैं कितनी सफल हुई लिखने में आप सभी अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजियेगा।
धन्यवाद 🙏🙏🙏

                                                REKHA GUPTA 
LAFZBINDU 

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